लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी — मानवीय इतिहास में कुछ ऐसे स्थान होते हैं जहाँ ज़मीन महज़ ज़मीन नहीं रहती, बल्कि वह आसमान से जुड़ जाती है। क़ुम भी एक ऐसी ही धरती है—ख़ामोश मगर गोया (बोलती हुई), सादा मगर रहस्यों से भरी, जहाँ हर सांस में विलायत की ख़ुशबू और हर कोने में ज्ञान की गूंज सुनाई देती है। यह वह शहर है जिसे एक महान ख़ातून के संक्षिप्त मगर बरकत वाले जीवन ने हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया—हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स), जिनका अस्तित्व क़ुम के लिए आत्मा और उम्मत के लिए चिराग़ बन गया।
मदीना मुनव्वरा की नूरानी वायु में आपका जन्म एक ऐसे ख़ानदान में हुआ जिसके हर व्यक्ति ने इतिहास को नई दिशा दी। आपने आँख खोली तो ज्ञान आपके सामने था, इबादत आपके वातावरण में थी, और विलायत आपकी सांसों में रची-बसी थी। क़ुरआन ने अहले बैत (अ) की इसी पवित्रता को इस प्रकार व्यक्त किया:
إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا (सूर ए अहज़ाब: 33) "अल्लाह का इरादा यही है कि ऐ अहले बैत! तुमसे हर अपवित्रता (गंदगी) को दूर रखे और तुम्हें पूर्ण पवित्रता प्रदान करे।"
यह आयत केवल एक विशिष्टता नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी की घोषणा भी है—और हज़रत मासूमा (स) ने अपने संक्षिप्त जीवन में इस ज़िम्मेदारी को इस तरह निभाया कि इतिहास हैरान रह गया।
आपके जीवन का सबसे चमकीला पहलू वह हिजरत है जो दिखने में एक बहन की अपने भाई से मिलने की अभिलाषा थी, मगर वास्तव में यह एक विचारगत और आध्यात्मिक आंदोलन था। जब इमाम अली रज़ा (अ) को अब्बासी सरकार ने ख़ुरासान स्थानांतरित कर दिया, तो मदीना की गलियाँ सूख गईं। इस जुदाई ने हज़रत मासूमा (स) के दिल में एक ऐसा शोला भड़काया जो उन्हें यात्रा पर ले आया। यह यात्रा केवल मीलों की नहीं, बल्कि एक संदेश की यात्रा थी—सत्य के साथ वफ़ादारी का, ज़ुल्म के सामने धैर्य का, और विलायत के प्रचार का।
रास्ते की कठिनाइयाँ, सावा का हादसा, और बीमारी की हालत—यह सब इस बात के प्रमाण हैं कि यह यात्रा साधारण नहीं थी। इसी हालत में आपने क़ुम का रुख किया, मानो आपको पता था कि इस धरती को आपके द्वारा एक नया इतिहास रचना है। जब आप क़ुम पहुँचीं, तो लोगों ने जिस श्रद्धा से स्वागत किया, वह इस बात का प्रमाण था कि दिलों में अहले बैत (अ) का प्रेम पहले ही बस चुका था, और अब उसे एक केंद्र मिल गया था।
आपके संक्षिप्त प्रवास ने क़ुम को बदलकर रख दिया। कुछ दिनों की इबादत, दुआ और शांत शिक्षा ने इस शहर की आत्मा में ऐसा असर छोड़ा कि वह सदियों तक बना रहा। यही कारण है कि अइम्मा (अ) ने क़ुम और हज़रत मासूमा (स) की महानता को बार-बार बयान किया है। इमाम जाफ़र सादिक (अ) का इरशाद है:
أَلَا إِنَّ قُمَّ عُشُّ آلِ مُحَمَّدٍ وَمَأْوَى شِيعَتِهِمْ (बिहारुल अनवार, जिल्द 60, पृष्ठ 217) "ध्यान देने योग्य बात है कि क़ुम आले मुहम्मद (अ) का आशियाना और उनके शियों की पनाहगाह है।"
और एक अन्य रिवायत में हज़रत मासूमा (स.अ.) की शान इस प्रकार व्यक्त हुई है:
مَنْ زَارَهَا عَارِفًا بِحَقِّهَا فَلَهُ الْجَنَّةُ (बिहारुल अनवार, जिल्द 60, पृष्ठ 228) "जो उनकी ज़ियारत उनके अधिकार की पहचान के साथ करेगा, उसके लिए जन्नत है।"
यह "मारफ़त" वास्तव में उस संदेश को समझने का नाम है जो हज़रत मासूमा (स) ने अपने जीवन से दिया—कि ज्ञान विलायत के बिना अधूरा है, और विलायत चेतना के बिना प्रभावहीन।
आज क़ुम को देखें तो वह एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवित संस्थान प्रतीत होता है। यहाँ हजारों मदरसे, पुस्तकालय, शोध केंद्र और वैज्ञानिक हलके मौजूद हैं। दुनिया के विभिन्न देशों से आए हुए विद्यार्थी इस शहर में धार्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, और यही वह स्थान है जहाँ विचार, इबादत और कर्म एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। यहाँ के मदरसों में केवल किताबें नहीं खुलतीं, बल्कि दिमाग भी रौशन होते हैं, और यहाँ के आंगनों में केवल क़दम नहीं पड़ते, बल्कि तकदीरें बदलती हैं।
क़ुम के वातावरण में एक अजीब सी शांति है। सुबह के समय जब अज़ान की आवाज़ हरम के गुंबद से टकराकर पूरे शहर में फैलती है, तो ऐसा लगता है मानो स्वयं ज़मीन भी इबादत में लग गई हो। दिन के समय विद्यार्थियों के विचार-विमर्श, रात के समय ज़ाइरीन की दुआएँ—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो दुनिया के किसी अन्य स्थान पर कम ही देखने को मिलता है।
इसी धरती से विचारगत जागरूकता की वे लहरें उठीं जिन्होंने ज़माने का रुख बदल दिया। यहाँ से उठने वाली आवाज़ों ने न केवल एक देश, बल्कि पूरी उम्मत को प्रभावित किया। यह इस बात का प्रमाण है कि जब ज्ञान और आध्यात्मिकता एक स्थान पर इकट्ठा हो जाएँ, तो वे केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि इतिहास को बदल देते हैं।
हरम-ए-हज़रत मासूमा (स) आज भी केवल एक ज़ियारत स्थल नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षण केंद्र है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ लेकर जाता है—कोई शांति, कोई विश्वास, कोई दृढ़ संकल्प, और कोई आँसू। यह वह स्थान है जहाँ दिल नरम होते हैं, निगाहें झुक जाती हैं, और इंसान अपने रब के करीब हो जाता है।
दुआ: ऐ ख़ुदा! जिस तरह तूने इस पवित्र खातून के माध्यम से क़ुम को ज्ञान और प्रकाश का केंद्र बनाया, हमें भी वह प्रकाश प्रदान कर कि हम अपने जीवनों को तेरे दीन के लिए समर्पित कर सकें। हमें वह बसीरत दे कि हम सत्य को पहचान सकें, और वह स्थिरता दे कि हम उस पर कायम रह सकें। और हमें हज़रत मासूमा (स) का सच्चा प्रेम और उनकी ज़ियारत की तौफ़ीक़ प्रदान कर।
आमीन या रब्बल आलमीन।
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